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संस्कृत वाङ्मय में जलवायु संरक्षण के उपायः एक विवेचनात्मकाध्ययन

Author : सावित्री और डॉ. पूनम पाण्डेय

Abstract :

संस्कृत साहित्य भारतीय संस्कृति का प्रधान वाहक है।भारतीय संस्कृति प्रकृति के पवित्र वातावरण और तपोवन में पल्लवित तथा पुष्पित हुई है। संस्कृत साहित्य में वर्णित रम्य और भव्य जलवायु विश्व के अन्य साहित्य में प्राप्त नहीं होती। हमारे समाज की सांस्कृतिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, नैतिक जलवायु की समृद्धि का प्रमुख कारण हमारा समृद्ध साहित्य ही है। प्राचीन ऋषि मुनियों ने जलवायु संरक्षण को सर्वाधिक महत्व दिया क्योंकि वह जानते थे कि पेड़-पौधे, पशु-पक्षी तथा जीव-जंतुओं का विनाश हो गया तो विश्व पर्यावरण प्रदूशित हो जाएगा और मनुष्य का बचना दुर्लभ हो जाएगा, क्योंकि शुद्ध पर्यावरण में ही मनुष्य का जीवन संभव है शुद्ध हवा, शुद्ध जल के अभाव में मनुष्य का जीवित रहना असंभव है।
जलवायु संरक्षण वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है जो मानव के अपने ही द्वारा किए गए अधर्मजन्य अपराधों से उत्पन्न हुई है।जलवायु असंतुलित हो गई है उसके भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं।विवेक हीनता के कारण जलवायु के प्रति हमारा अपराध बढ़ता जा रहा है हम अपनी जलवायु का सदैव दोहन करने के स्थान पर उसका क्रूर शोषण कर रहे हैं। नदियाँ सुख रही हैं। उनमें अब जल का स्तर सिमट गया है, वन बड़ी तेजी से कट रहे हैं, हरियाली समाप्त हो रही है, पर्वत नंगे होकर ठिठुर रहे हैं, वायुमंडल जहरीली गैसों का भंडार बनता जा रहा है, ओजोन परत छीड हो रही है, आकाश इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों का रण स्थल बन चुका है। पशु-पक्षियों और वनस्पतियों की न जाने कितनी प्रजातियां हमारी आंखों के सामने ही लुप्त हो चली है। पृथ्वी कराह रही है।समुद्र कांप रहे हैं।प्रकाश विकृत हो रहा है। फलतः सारे राष्ट्र त्राहि त्राहि का अंतरनाद कर रहे हैं फिर भी जागरूकता और जन चेतना के अभाव में आंख मूंद कर हम जिस डाली पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं। इस भीषण वर्तमान समस्या के समाधान के लिए निश्चय ही हमें देव वाणी संस्कृतऔर सनातन संस्कृति की शरण में जाना होगा यदि हम वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जलवायु के प्रति चिंतित हैं तो हमें अनिवार्यतः साहित्यक उपायों का आश्रय लेना चाहिए और उस चेतना का जन-जन में प्रचार प्रसार करना चाहिए।

Keywords :

जलवायु परिवर्तन, जनचेतना, इलेक्ट्रॉनिक प्रदूषण, मौसम गतिविधियां, जलवायवीय संघटनाएं आदि।