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प्रत्यभिज्ञा दर्शन में शिव की अवधारणा

Author : डॉ. परमानन्द

Abstract :

प्रत्यभिज्ञा दर्शन में शिव अपने क्रिया स्वातंत्रय के माध्यम से जगत की अभिव्यक्ति करता है।शिव की यह विशेषता है कि वह एक साथ पर और अपर दोनों है जो उसका स्वरूप है। शिव चिंमात्र नहीं चेतन है। चैतन्य शिव का स्वभाव है। इसी चैतन्य को चित, संवित, स्फुरत्ता, सार, शक्ति स्वातंत्र अथवा शिव का ऐश्वर्य कहा जाता है। वह सत अथवा अस्ति मात्र नहीं है अपितु उसमें अपने अस्तित्व के प्रकाशन की क्षमता भी विद्यमान है। अतः अस्तित्व-भांति, प्रकाश-विमर्श यह दो भिन्न-भिन्न तत्व न होकर दोनों सामरस्य है। पूर्ण सामरस्य और समन्वय का यही सिद्धांत अद्वयवाद है। शिव तत्व ही सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह और अनुग्रह रूप पांच कृत्यौ को निरंतर करता रहता है।

Keywords :

विश्वातीत, लीलाविलास, ऐश्वर्य, परासंवित, प्रमाता,स्फुरत्ता, स्वातंत्रता आदि।