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21वीं सदी के कौशल विकास में प्राचीन भारतीय दार्शनिक मूल्यों की प्रासंगिकता: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author : मंजू लता गुप्ता और डॉ. धारा श्री श्रीवास

Abstract :

प्रस्तुत शोध पत्र "21वीं सदी के कौशल विकास में प्राचीन भारतीय दार्शनिक मूल्यों की प्रासंगिकता" के अंतर्संबंधों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। समकालीन वैश्विक परिदृश्य में जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वचालन और तीव्र तकनीकी परिवर्तनों ने 'कौशल' (Skills) की परिभाषा को बदल दिया है, वहीं मानवीय मूल्यों और मानसिक स्वास्थ्य का संकट भी गहराया है। यह शोध इस परिकल्पना पर आधारित है कि आधुनिक युग के अनिवार्य कौशल—जैसे आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking), रचनात्मकता, सहयोग और भावनात्मक बुद्धिमत्ता—प्राचीन भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांतों में पहले से ही विद्यमान हैं।
अध्ययन के अंतर्गत उपनिषदों की 'नेति-नेति' पद्धति का आधुनिक तार्किक सोच के साथ, पतंजलि के 'अष्टांग योग' का तनाव प्रबंधन के साथ, और भगवद्गीता के 'स्थितप्रज्ञ' सिद्धांत का भावनात्मक स्थिरता के साथ तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। शोध यह स्पष्ट करता है कि ऋग्वेद का 'संगठन सूक्त' और चाणक्य का 'राजधर्म' आधुनिक टीम वर्क और नैतिक नेतृत्व (Ethical Leadership) के उत्कृष्ट मॉडल हैं। कौशल विकास की वर्तमान प्रक्रिया को यदि प्राचीन भारतीय मूल्यों जैसे 'सा विद्या या विमुक्तये' और 'वसुधैव कुटुंबकम्' के साथ एकीकृत किया जाए, तो यह न केवल व्यक्ति की व्यावसायिक क्षमता में वृद्धि करेगा, बल्कि उसे एक जिम्मेदार वैश्विक नागरिक के रूप में भी विकसित करेगा। अंततः, यह शोध पत्र नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के आलोक में प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को 21वीं सदी की चुनौतियों का एकमात्र स्थायी समाधान सिद्ध करता है I

Keywords :

कौशल विकास, प्राचीन भारतीय दर्शन, 21वीं सदी के कौशल, अष्टांग योग, भगवद्गीता, राष्ट्रीय शिक्षा नीति I