ज्योतिष शास्त्र में पर्यावरण चिंतन
Author : डॉ. यज्ञ आमेटा
Abstract :
भारतीय ज्ञान-परंपरा में पर्यावरण की अवधारणा केवल भौतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है, अपितु वह चेतन, नैतिक और आध्यात्मिक तत्त्वों से संयुक्त एक समग्र व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित रही है। वेद, उपनिषद, पुराण, स्मृति तथा वेदाङ्ग साहित्य में प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व का गहन दर्शन उपलब्ध होता है। इन्हीं वेदाङ्गों में से एक "ज्योतिष शास्त्र" न केवल कालगणना एवं खगोलीय विज्ञान का विषय है, बल्कि वह पर्यावरणीय संतुलन, ऋतुचक्र, पंचमहाभूत तथा ग्रह-नक्षत्रों के माध्यम से प्रकृति और मानव जीवन के पारस्परिक संबंधों को भी स्पष्ट करता है।
प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य यह प्रतिपादित करना है कि ज्योतिष शास्त्र में पर्यावरण चिंतन एक सुसंगठित, वैज्ञानिक तथा दार्शनिक दृष्टि के रूप में अंतर्निहित है। ग्रहों की गति, ऋतुओं का निर्धारण, वर्षा-अनावृष्टि, प्राकृतिक आपदाओं तथा मानव स्वास्थ्य—इन सभी विषयों को ज्योतिषीय परंपरा ने पर्यावरणीय संदर्भ में समझने का प्रयास किया है। आधुनिक युग में जब जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव-विविधता का क्षरण तथा पारिस्थितिक असंतुलन जैसी समस्याएँ विकराल रूप धारण कर चुकी हैं, तब ज्योतिषीय दृष्टि एक वैकल्पिक, सांस्कृतिक एवं संतुलित समाधान प्रस्तुत कर सकती है। यह अध्ययन सिद्ध करता है कि ज्योतिष शास्त्र का पर्यावरण चिंतन आज भी प्रासंगिक और उपयोगी है I
Keywords :
ज्योतिष शास्त्र, पर्यावरण चिंतन, पंचमहाभूत, ग्रह-नक्षत्र, ऋतुचक्र, पारिस्थितिकी, भारतीय ज्ञान परंपरा, सतत विकास I